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प्राविधिक शिक्षा विभाग में ‘जातिगत तानाशाही’ और स्थानांतरण महाघोटाला, नियम तोड़ने वालों को मलाई और ईमानदार दलितों एवं अन्य वर्ग को प्रताड़ना

प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर घोटाला की लीक हुई आंतरिक फाइलों ने लखनऊ से लेकर वाराणसी तक पूरे प्रशासनिक अमले में एक बड़ा भूचाल ला दिया है। सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाकर रसूखदारों को मनचाही कुर्सियां सौंपने के इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है।

नीति को ठेंगा दिखाकर रसूखदारों को ‘अंगद’ जैसी पोस्टिंग देने का खेल खेला गया है। विभागीय स्तर से लीक हुए सनसनीखेज दस्तावेजों के अनुसार, स्थानांतरण नीति के प्रावधानों का खुला उल्लंघन कर चहेते अधिकारियों को बार-बार घूम-फिरकर उन्हीं जिलों में भेजा जा रहा है जहाँ वे पहले से दशकों तक जमे हुए थे।

श्री संजीव सिंह को नियमों को दरकिनार कर दोहरा प्रभार सौंपा गया है। लखनऊ में पहले ही 20 वर्ष से अधिक की लंबी सेवा दे चुके इस अधिकारी पर विभाग इतना मेहरबान है कि इन्हें पुनः लखनऊ में ही बनाए रखा गया। इन्हें प्रधानाचार्य पद के साथ-साथ सचिव, संयुक्त प्रवेश परीक्षा परिषद (JEECUP) की भी जिम्मेदारी मिली है।

श्री इंद्रजीत सचान पिछले दो दशकों से राजधानी लखनऊ में ही अंगद के पैर की तरह जमे हुए हैं। शासकीय नियमों का खुला मखौल उड़ाते हुए राजकीय पॉलीटेक्निक, लखनऊ के यह विभागाध्यक्ष अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए हैं, जो नीतिगत पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

श्री पी.के. सिंह को नियमों को ताक पर रखकर दोबारा झांसी मंडल में मलाईदार तैनाती मिली है। झांसी मंडल में पहले ही 20 से अधिक वर्षों तक तैनात रहने का रिकॉर्ड बनाने वाले इस अधिकारी का जब ट्रांसफर हुआ, तो इन्हें फिर से झांसी मंडल के राजकीय पॉलीटेक्निक, तालबेहट (ललितपुर) भेज दिया गया।

श्री पी.एन. जायसवाल को कानपुर में लंबी सेवा के बाद दोबारा वहीं की सौगात दी गई है। केमिकल विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में कानपुर में 10 से अधिक वर्षों की लंबी तैनाती का लुत्फ उठाने के बाद नीति के विरुद्ध दोबारा घूम-फिरकर इन्हें राजकीय पॉलीटेक्निक, कानपुर में ही नई पोस्टिंग दी गई है।

श्री आत्म प्रकाश सिंह की पोस्टिंग का पहिया लगातार लखनऊ और कानपुर के बीच ही घूमता रहता है। कंप्यूटर साइंस के विभागाध्यक्ष के ट्रांसफर और संबद्धीकरण (अटैचमेंट) को लेकर विभाग की विशेष मेहरबानी साफ दिखाई देती है, जिससे दूसरे ईमानदार अधिकारी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।

श्री बी.एन. चौधरी का एम.एम.आई.टी. गोरखपुर ट्रांसफर सीधे तौर पर भारी अनियमितता की ओर इशारा करता है। स्थानांतरण नीति के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत किए गए इस फैसले ने इस पूरे प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर घोटाला की जड़ों को और गहरा साबित कर दिया है।

गंभीर आरोपों के बाद भी दागी अधिकारियों को विभाग में लगातार अभयदान मिल रहा है। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उच्छृंखलता के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय आरोपियों को खुला संरक्षण मिलने से ईमानदार दलितों एवं अन्य पीड़ित वर्ग के कर्मचारियों में भारी आक्रोश व्याप्त है।

श्री प्रवेश वर्मा पर भयंकर आरोपों के बावजूद अब तक कोई दंडात्मक कार्यवाही नहीं की गई है। राजकीय पॉलीटेक्निक, मोहम्मदी, लखीमपुर के इस प्रभारी प्रधानाचार्य पर तत्कालीन जाँच रिपोर्ट के आधार पर शिकंजा कसने के बजाय उन्हें संस्था का सर्वेसर्वा बनाए रखने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

अवैध संबद्धीकरण (Attachment) का एक बड़ा सिंडिकेट विभाग के भीतर गुपचुप तरीके से चल रहा है। बिना किसी वैधानिक आधार के मूल तैनाती से हटाकर चहेतों को अन्यत्र संबद्ध करने के इस खेल में विभाग के कई रसूखदार नाम शामिल पाए गए हैं।

श्री विकल्प कुमार सिंह और श्री अवधेश पटेल समेत कई अधिकारियों के अटैचमेंट की जांच मांग की गई है। इसके साथ ही श्री कमल कुमार, श्री रोहित कटियार, श्री जितेन्द्र यादव, श्रीमती रश्मि सोनकर, श्री जीतेन्द्र मौर्या, श्री विवेकानंद और श्री अलोक कुमार की मूल तैनाती की फाइलों को खंगाला जा रहा है।

विशेष तकनीकी सेल के गठन की उपयोगिता और कार्यप्रणाली पर भी अब बड़ा संदेह जताया गया है। इस सेल द्वारा गठन के बाद से अब तक दिए गए कुल शून्य परिणामों और सरकारी धन व संसाधनों के दुरुपयोग को लेकर इसकी कड़ाई से जांच करने की मांग तेज हो गई है।

माननीय मुख्यमंत्री से इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच कराकर जीरो टॉलरेंस नीति बचाने की गुहार लगाई गई है। बेबाक लेखक अनिल तिवारी के अनुसार, इस प्राविधिक शिक्षा विभाग ट्रांसफर घोटाला और प्रशासनिक अराजकता को लेकर उत्तर प्रदेश के मुखिया से सीधे हस्तक्षेप की मांग की गई है।

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